ओम् अंगारकाय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि तन्नो भौम प्रचोदयात् ।।

एक मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में नवग्रह से प्रभावित होता है ये नौ ग्रह ही मनुश्य के जीवन में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से अच्छे एवं बुरे प्रभाव डालते है, ग्रह की अच्छी स्थिति होने पर जहॉं एक व्यक्ति अपने जीवन में सभी और सहज सफलता प्राप्त करता है तो वही अन्य व्यक्ति को ग्रहो के बुरे प्रभाव के कारण उसे अपने जीवन मे असफलता ही हाथ लगती है । इन्ही नवग्रहो में से शनि के पश्चात मंगल ग्रह का विशेष प्रभाव होता है जो जातक के सम्पूर्ण जीवन पर प्रभाव डालता है । आईये जाने जन्म कुण्डली में मांगलिक दोष कब होता है ? जन्म–कुण्डली के कुल बारह भावों में जब मंगल ग्रह प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अश्टम एवं द्वादश भाव में होता है, जो जातक की कुण्डली मांगलिक दौश युक्त हो जाती है :

उदाहरणार्थ:

मांगलीक दोश जातक के कुण्डली में व्यापार,व्यवसाय, विवाह सम्बन्ध, भाग्य, केरियर एवं स्वास्थ्य इत्यादि पर प्रभाव डालता है ।

विवाह पर प्रभाव

विवाह सम्बन्ध इत्यादि में मंगल दोष प्रभाव

मांगलिक दोष युक्त कुण्डली का सबसे ज्यादा प्रभाव विवाह सम्बंन्ध इत्यादि पर पड़ता है। मांगलिक दोष होने पर :

  • विवाह सम्बंन्ध तय नही हो पाना
  • विवाह सम्बन्ध तय होकर छूट जाना
  • अधिक उम्र गुजरने पर भी विवाह न होना
  • विवाह के समय विघ्न आना
  • विवाह पश्चात जीवन साथी से विवाद होना इत्यादि बातो पर प्रभाव डालता है ।
भावानुसार मंगल के प्रभाव:

प्रथम भाव में यदि मंगल हो एवं अशुभ ग्रहो (शनि, राहु, क्षीण चन्द्रमा) के साथ हो व शत्रु राशि (कुंभ, मकर) में हो तो मंगल दोष होता है । ऐसी स्थिति से जातक का विवाह अधिक उम्र में होता है तथा विवाह में विलम्ब की स्थिति उत्पन्न होती है ।

चतुर्थ भावगत मंगल :

चतुर्थ भाव में यदि अशुभ मंगल होतो ऐसे जातक का विवाह शीघ्र होता है परंतु विवाह पश्चात वैवाहिक जीवन में सुख का अभाव हो जाता है व घर–गृहस्थी में क्लेश, घर के बडे बुजु‍र्ग से अनबन होना तथा भूमि भवन से सम्बन्धित मामलो में उलझने पैदा होने लगती है ।

सप्तम भावगत मंगल :

सप्तम भावस्थ अशुभ मंगल जातक के विवाह सम्बंध में बाधा कारक होता है । यदि सप्तम भाव में मंगल अशुभ ग्रहो के साथ बैठा हो तो जातक का विवाह होने मे बढी कठीनाइयो का सामना करना पढ़ता है । ऐसे जातक का यदि बिना कुण्डली मिलान कर विवाह किया जावें तो जीवन साथी के बीच सर्वथा प्रेम का अभाव पाया जाता है, तथा विवाह सम्बन्ध विच्छेद होने के अधिक योग निर्मित हो जाते है, यदि सप्तम भाव पर अशुभ ग्रहो की दृष्टि हो जावें तो ऐसे जातक का चरित्र भी खराब होता है ।

अष्टमभाव मंगल :

जन्म कुण्डली में अष्टम भावस्थ अशुभ मंगल होतो जातक स्वयं अथवा उसके जीवनसाथी के कुसंगति में पडने के योग बनते है। जैसे जुआ, सट्टा, लॉटरी आदि तथा अपने जीवन साथी के अतिरिक्त अन्य से प्रेम सम्बन्ध इत्यादि दोष निर्मित होते है, साथ ही यदि अष्टम भाव मे अशुभ मंगल पर मारक ग्रहो का प्रभाव होतो जातक का स्वयं को अथवा जीवनसाथी को मृत्यु या मृत्यु तुल्य कष्ट भी प्राप्त होता है।

द्वादश भावगत मंगल :

द्वादश भावस्थ अशुभ मंगल जातक के वैवाहिक जीवन में अत्यधिक खर्च एवं अप्रत्याशित हानि की स्थिति निर्मित करता है। ऐसे जातक के विवाह पश्चात आय कम एवं खर्च अधिक हो जाने से पारिवारिक सन्तुलन बिगड़ जाता है।

जातक पर मंगल का प्रभाव

मंगलदोष का जातक पर प्रभाव :

प्रथम भाव में मंगल :– किसी जातक की जन्मकुण्डली में मांगलिक दोष होने पर उसके व्यक्तित्व में विशेष प्रभाव तो नही पढ़ता है। किन्तु सामान्य जीवन पर प्रभाव अवश्य देखने को मिलते है। जन्मकुण्डली के प्रथम भाव मे यदि मंगल शुभ ग्रहो एवं शुभ राशि से युक्त हो तो ऐसे जातक प्रतिभाशाली, उन्नतिशील एवं आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी होते है। उनके चेहरे पर विशेष तेज रहता है जिससे अन्य लोग उनके व्यक्तित्व मे सदा प्रभावित रहते है। यदि प्रथम भाव मे मंगल अशुभ ग्रहो एवं शत्रु राशि में है। जो जातक निस्तेज , हीनभावना का शिकार, आत्मविश्वास की कमी एवं रक्त अल्पता से पीडित रहता है। उनके शरीर में सदा खुन की कमी बनी रहती है तथा स्वभाव चिढ़चिढा रहता है।

चतु‍र्थ भाव में मंगल :

जन्मकुण्डली के चतुर्थ भाव में शुभ ग्रहो से युक्त मंगल होने पर ऐसा जातक भूमि–भवन एवं धन सम्पदा से परिपूर्ण होता है। स्वयं के बल पर विशेष सफलता प्राप्त होती है। तथा जीवन मे अपनी माता का पूर्ण सुख, स्नेह एवं आर्शीवाद प्राप्त होता है, यही स्थिति यदि उलटी रहे अर्थात अशुभ ग्रहो से युक्त एवं शत्रु क्षेत्री रहे तो ऐसा जातक निर्धन, एवं माता के सुख के वंचित होता है।

सप्तम् भावस्थ मंगल :

कुण्डली के सप्तम् भाव में यदि बलवान मंगल बैठा हो एवं साथ मे यदि चन्द्रमा की युति हो तो ऐसा जातक खेल कुद एवं प्रतियोगीता मे विशेष योग्यता प्राप्त होता है। अशुभ मंगल सप्तम भावस्थ होने पर जीवन साथी के सुख मे अभाव आता है।

अष्टम् भावस्थ मंगल :

जातक की कुण्डली के आठवें भाव में यदि बलवान मंगल बैठा हो तो ऐसा जातक आकस्मिक लाभ प्राप्त करता है। जुआ सट्टा लाटरी इत्यादि से लाभ की विशेष संभावना बनी रहती है। निर्बल मंगल यदि इस भाव मे हो तो जातक अल्पायु एवं जीवन भर कष्ट पाने वाला होता है।

द्वादश भावस्थ मंगल :

शुभ ग्रहो एवं शुभ राशियों से युक्त मंगल जातक को विदेश प्रवास के योग निर्मित करता है। यदि चन्द्रमा के साथ मंगल बैठा हो तो ऐसे जाक विदेशो से विषेश उन्नति प्राप्त करते है। एक ही स्थान पर नही रहते है।

मंगल न होने पर प्रभाव

मांगलिक दोष न होने पर मंगल के प्रभाव

यदि किसी जातक की जन्म कुण्डली के 1,4,7,8,12 वें भाव में मंगल नही है अर्थात मांगलिक दोष नही है तो भी यदि जन्म कुण्डली के द्वितीय (2) एवं षष्ठम् (6) भाव में मंगल होने पर अनिष्ट प्रभाव आते है। द्वितीय भाव में अषुभ मंगल जातक को नेत्र रोगी, धनहीन तथा संतान सम्बंधी बाधा उत्पन्न करने के साथ साथ भाग्य स्थान को भी कमजोर बनाता है, षष्ठ भाव में मंगल जातक को रोगी तथा रक्त सम्बंधी बिमारीयों व चर्म रोग से ग्रसित करता है, अर्थात इन भावो में मंगल होने पर भी शान्ति कराना आवश्यक है, जिससे शुभ फलो की प्राप्ति होती है।

व्यापार, व्यवसाय एवं केरियर

स्वस्थ्य एवं आयु पर प्रभाव

मांगलिक दोष मे स्वास्थ आयु एवं भाग्य :

जातक की कुण्डली के 1, 4, 7, 8, 12 वें भाव मे मंगल हो तो सामान्यत: जातक के स्वास्थ पर उसका कोई विशेष प्रभाव नही देखा गया है , वरन ऐसे जातक उन्नत स्वास्थ्य से सम्पन्न तथा अच्छी बौद्विक क्षमता वाले होते है। अष्टम भाव में मंगल आयु मे वृद्वि करने वाला होता है। किन्तु भाग्य स्थान का कमजोर करता है रूपये, धन सम्पत्ति, जीवनसाथी, आकस्मिक दुर्घटना एवं खर्च की स्थिति ये उतार–चढाव निर्मित होते रहते है।

भात पूजन केवल उज्जैन में ।

मंगल दोष के दुष्प्रभाव से बचाव के उपाय

जन्म लग्न कुण्डली के उपरोक्त मांगलीक दोषो के कारण मानव जीवन पर होने वाले दुष्प्रभावो को पूजा पाठ, जाप, अनुष्ठान, दान आदि के द्वारा पूर्णत: समाप्त किया जा सकता है। एवं मंगल के शुभ प्रभावो को बढाया जा सकता है। जिसके कुछ उपाय निम्नानुसार वर्णन किये जा रहा है ऐसे जातकगण जिनकी कुण्डली में मांगलिक दोष है वे इससे पूरी तरह लाभान्वित होंगे ।

मंगल ग्रह शान्ति :

चुंकि मंगल एक उग्र एवं विस्फोटक ग्रह है, यदि मंगल आपकी लग्न कुण्डली को प्रभावित कर रहा है तो इसकी शान्ति कराना उतना ही आवश्यक है, जिस तरह एक व्यक्ति बिमार पडने पर औषधियो को लेने पर ही ठीक होता है, उसी तरह मंगल दोष निवारण के प्रभावी उपाय निम्नलिखित है:

मंगल ग्रह की शांति भात पूजन द्वारा

सम्पूर्ण विश्व में भारत देश के अंर्तगत मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में एक मात्र मंग्रल ग्रह का मंदिर है, जहॉं ब्रम्हाण्ड से मंगल ग्रह की सीधी किरणे कर्क रेखा पर स्थित स्वयंभू शिवलिंग के उपर पढती है, जिससे यह शिवलिंग मंगल ग्रह के प्रतीक स्वरूप में जाना जाता है तथा यहॉ पर पूजन, अभिषेक, जाप व दर्शन से मंगलदोश का निवारण होता है।

मंगल दोश निवारण भात पूजन द्वारा एक मात्र अवंतिका ( उज्जैन ) में ही सम्पन्न कराया जाता है। यहॉ विधिवत् भात पूजन कराने से मंगल ग्रह के दुष्प्रभाव में कमी आकर शुभ फलो की वृद्धि होती है।

पूजन की विधि

भात पूजन में सर्वप्रथम गणेश गौरी पूजन के पश्चात नवग्रह पूजन, कलश पूजन एवं शिवलिंग रूप भगवान का पंचामृत पूजन एवं अभिषेक वैदिक मंत्रोचार द्वारा किया जाता है , पश्चात भगवान को भात अर्पित कर आरती एवं पूजन किया जाता है। जिससे पूजन कराने वाले को विशेष शुभ फलो की प्राप्ति होती है। भात पूजन मंग्रह दोष निवारण का प्रभावी एवं त्वरित उपाय है ।

मूंगा धारण

मंगल ग्रह शांति मूंगा धारण करने से

सामान्य उपाय में यदि आप मंगल ग्रह के कुप्रभाव से ग्रसित है तो एक बार मुंगा अवश्य धारण करे मुंगा धारण करने से पूर्व निम्नांकित बातो का ध्यान रखे :

  • मुंगे का चयन करने के पूर्व यह आवश्यक है कि यह कम से कम 5 रत्ती का अवश्य होना चाहिये।
  • मुंगा चमकदार, साफ, स्वच्छ निर्दोष एवं चिकनापन लिये होना चाहिये ।
  • कभी–भी टुटा–फुटा स्क्रेच किया हुआ गड्डेदार, घीसा हुआ मूंगा धारण नही करना चाहिए ।
  • मूंगे कि असलियत परख कर ही धारण करना चाहिए ।
  • अण्डाकार मूंगा जीवन में उन्नति एवं गतिशीलता के लिए धारण करना चाहिए ।
  • त्रिभूजाकार मूंगा शत्रुओ एवं रोगो से ग्रसित व्यक्तियों को साथ ही जिनके विवाह में रूकावट बाधॉंऐं अथवा मंगल के कारण विलम्ब हो रहा हो तो धारण करना चाहिए ।
  • लॉकेट के रूप में मूंगा लग्न कुण्डली के केन्द्र में मंगल होने पर अथवा ज्यादा खराब स्थिति होने पर एवं स्त्रीयो को धारण करना चाहिए ।

मूंगा धारण करने की विधि मूंगा, सोना, तॉबा अथवा पंचधातु की अंगुठी के साथ साथ चॉदी में भी धारण किया जा सकता है। सबसे ज्यादा प्रभावशील स्वर्ण धातु में होता है। इसे मंगलवार के दिन शुभ नक्षत्र में शुभ मुहु‍र्त में बनवाना व पहनना चाहिए तभी यह पुरी तरह असरकारक होगा। मूॅगे की अंगुठी बनाकर इसका विधिवत् पूजन, जाप एवं शुद्धि करण के पश्चात् मंगलवार के दिन समय....................... के मध्य ओम् क्रॉं क्रीं क्रौं स: भौमाय नम: मंत्र के 1108 जप के पश्चात् पुरूषो को सीधे हाथ की तर्जनी उंगली (इ्रंडेक्स फिंगर) मे व महिलाओ को बॉए हाथ की तर्जनी उंगली मे धारण करना चाहिए ।

नोट :

मूंगा अंगुठी में धारण करने से पूर्व इसकी एक बार जॉच अवश्य करे जॉच करने के लिए मूंगें को मंगलवार के दिन शुभ समय देखकर लालरंग के कपड़े में बांधकर अपने सीधे हाथ के बाजु में बांधे तथा इसके शुभ एवं अशुभ प्रभाव को 7,8 दिनो तक नोट करे यदि मूंगा धारण करने पर आपको शुभफलो की प्राप्त होने लगे तो इसे फिर अंगुठी में धारण करें यदि यह अशुभ प्रभाव छोडता है । जैसे मूंगा धारण करने पर अत्यधिक क्रोध आना, बेचेनी होना, पूर्व से चलरही समस्याओं का अचानक बढ जाना, भूमि भवन से अप्रत्याशित हानि हो जाना इत्यादि हो तो शीध्र ही इसे उतार दे व यह माना जाए की आपके अनुकुल नही है, आपको अन्य किसी अन्य उपाय की आवश्यकता है।

सिद्ध मंगल यंत्र

मंगल ग्रह के अनिष्ट प्रभाव को कम करने के लिए सिद्ध किया हुआ मंगल यंत्र का पूजन करना अत्यंत प्रभावशील माना गया है। मंगल यंत्र ताम्र–पत्र पर त्रिकोणाकार आकृति में उकेरा गया यंत्र होता है, जिसमें भगवान मंगल के 21 नामो को यथा स्थान लिखा गया है, इन नामो से भगवान का प्रतिदिन पूजन अर्चन करने से विशेष शुभ फलो की प्राप्ति होने लगती है। यह नामो का जाप इस प्रकार करे :

  • ओम् मंगलाय नम:
  • ओम् भूमिपुत्राय नम:
  • ओम् ऋणहन्त्रये नम:
  • ओम् धनप्रदाय नम:
  • ओम् स्थिरासनाय नम:
  • महाकामाय नम:
  • सर्वकाम विरोधकाय नम:
  • लोहिताय नम:
  • लोहितागाय नम:
  • सांगली कृपाकराय नम:
  • धरात्यजाय नम:
  • कुजाय नम:
  • भूमिदाय नम:
  • भौमाय नम:
  • धनप्रदाय नम:
  • रक्ताय नम:
  • सर्व रोग प्रहारिण्ये नम:
  • सृष्टि कर्ते नम:
  • वृष्टि कर्ते नम: 19. 20 21

इत्यादि नामो से मंगल यंत्र का पूजन करे । जिससे शुभ फलो की प्राप्ति होगी ।

मंगल वस्तुओ का दान
  1. मंगल ग्रह से संबंधित वस्तुओ का दान करने से मंगल ग्रह शांति होती है जैसे मसूर की दाल, तॉबे का बर्तन एवं सिक्का, व कम से कम एक मूंगा व यथा शक्ति दक्षिणा रखकर लाल कपडे की पोटली बनायें एवं मंगलवार के दिन अथवा जिस दिन मेष या वृश्चिक राशि में चंदमा हो तब किसी ब्राहम्ण को या शिव मंदिर में दान करना चाहिए ।
  2. लाल वस्तुओ एवं लाल फल का दान नौ मंगलवार तक करे ।
  3. मंगलवार से प्रारम्भ करके शहद एवं सिंदुर मिलाकर 43 दिन तक प्रतिदिन बहती नदी में प्रवाहित करे ।
  4. मीठी रोटी का दान करें ।
  5. हनुमानजी की आराधना करें एवं प्रति मंगलवार सिंदुर एवं चमेली के तेल से चोला चढ़ॉए ।

मंगल मंत्रो का जाप

मंगल मंत्रो के जाप से विशेष शुभफल प्राप्त होते है। मंगल ग्रह के वैदिक एवं पौराणिक तथा तांत्रिक में से किसी एक मंत्र का जाप करें जो निम्नानुसार है:

वैदिक मंत्र

उपरोक्त मंत्र को सुख शांति के लिए जाप करे ।

पौराणिक मंत्र

धरणी गर्भ.........

उक्त मंत्र का जाप विवाह से संबंधित मामले एवं धन सम्पत्ति इत्यादि के लिए करें ।

तांत्रिक मंत्र

ओम् क्रां क्रीं क्रों स:

उक्त तांत्रिक मंत्र का प्रयोग संकट से उभरने के लिए करे ।

जाप स्वयं करे, यदि संभव न हो सके तो योग्य ब्राहम्ण द्वारा जाप करावें । स्वयं जाप करते समय निम्न बातो को ध्यान मे रखे :

  • जाप प्रतिदिन निर्धारित संख्या में करे ।
  • जाप करने से पूर्व स्नान अवश्य करें ं।
  • जाप करते समय मस्तक पर लाल कुंकुम का तिलक अवश्य लगाऐं ।
  • शुद्ध कम्बल अथवा कुश के आसन पर बैठ कर जाप करें ।
  • मूॅगे की माला से मंगल मंत्रो के जाप करे तो अति उत्तम होगा ।
  • जाप के पूर्व मंगल यंत्र का पूजन अवश्य करे एवं शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करे तथा यह दीपक जाप होने तक जलता रहे इस बात का ध्यान रखे ।
  • जाप अवधि मे मौन धारण करे ।
  • एकाग्र चित्त एवं विचार शुन्य होकर जाप करे । ( इसका धीरे धीर ही अभ्यास होगा । ) उपरोक्त विधि अनुसार जाप करने से निश्चित रूप से लाभ प्राप्त होगा ।

जातक पर मंगल का प्रभाव

मंगलदोष का जातक पर प्रभाव :

प्रथम भाव में मंगल :– किसी जातक की जन्मकुण्डली में मांगलिक दोष होने पर उसके व्यक्तित्व में विशेष प्रभाव तो नही पढ़ता है। किन्तु सामान्य जीवन पर प्रभाव अवश्य देखने को मिलते है। जन्मकुण्डली के प्रथम भाव मे यदि मंगल शुभ ग्रहो एवं शुभ राशि से युक्त हो तो ऐसे जातक प्रतिभाशाली, उन्नतिशील एवं आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी होते है। उनके चेहरे पर विशेष तेज रहता है जिससे अन्य लोग उनके व्यक्तित्व मे सदा प्रभावित रहते है। यदि प्रथम भाव मे मंगल अशुभ ग्रहो एवं शत्रु राशि में है। जो जातक निस्तेज , हीनभावना का शिकार, आत्मविश्वास की कमी एवं रक्त अल्पता से पीडित रहता है। उनके शरीर में सदा खुन की कमी बनी रहती है तथा स्वभाव चिढ़चिढा रहता है।

चतु‍र्थ भाव में मंगल :

जन्मकुण्डली के चतुर्थ भाव में शुभ ग्रहो से युक्त मंगल होने पर ऐसा जातक भूमि–भवन एवं धन सम्पदा से परिपूर्ण होता है। स्वयं के बल पर विशेष सफलता प्राप्त होती है। तथा जीवन मे अपनी माता का पूर्ण सुख, स्नेह एवं आर्शीवाद प्राप्त होता है, यही स्थिति यदि उलटी रहे अर्थात अशुभ ग्रहो से युक्त एवं शत्रु क्षेत्री रहे तो ऐसा जातक निर्धन, एवं माता के सुख के वंचित होता है।

सप्तम् भावस्थ मंगल :

कुण्डली के सप्तम् भाव में यदि बलवान मंगल बैठा हो एवं साथ मे यदि चन्द्रमा की युति हो तो ऐसा जातक खेल कुद एवं प्रतियोगीता मे विशेष योग्यता प्राप्त होता है। अशुभ मंगल सप्तम भावस्थ होने पर जीवन साथी के सुख मे अभाव आता है।

अष्टम् भावस्थ मंगल :

जातक की कुण्डली के आठवें भाव में यदि बलवान मंगल बैठा हो तो ऐसा जातक आकस्मिक लाभ प्राप्त करता है। जुआ सट्टा लाटरी इत्यादि से लाभ की विशेष संभावना बनी रहती है। निर्बल मंगल यदि इस भाव मे हो तो जातक अल्पायु एवं जीवन भर कष्ट पाने वाला होता है।

द्वादश भावस्थ मंगल :

शुभ ग्रहो एवं शुभ राशियों से युक्त मंगल जातक को विदेश प्रवास के योग निर्मित करता है। यदि चन्द्रमा के साथ मंगल बैठा हो तो ऐसे जाक विदेशो से विषेश उन्नति प्राप्त करते है। एक ही स्थान पर नही रहते है।